काठमांडू/नई दिल्ली(ए)। भारत, नेपाल और चीन की सीमाओं के संगम पर स्थित रणनीतिक क्षेत्र ‘लिपुलेख’ को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक घमासान छिड़ गया है। नेपाल सरकार ने लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर आधिकारिक रूप से कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वह इस क्षेत्र में भारत या चीन की किसी भी गतिविधि को अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है। “हमारी जमीन पर हस्तक्षेप बंद हो” – नेपाल की दोटूक नेपाल के विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि लिपुलेख नेपाली भूमि का हिस्सा है। मंत्रालय के अनुसार, इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, विस्तार, सीमा व्यापार या यातायात जैसी किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए भारत सरकार से बार-बार आग्रह किया गया है। नेपाल ने दावा किया कि उसने भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक माध्यमों से अपनी “स्थायी स्थिति” से अवगत करा दिया है।
ऐतिहासिक संधियों का हवाला और बढ़ता तनाव
नेपाल का यह कड़ा रुख 1816 की सुगौली संधि पर आधारित है। नेपाल का दावा है कि महाकाली नदी के पूर्वी हिस्से में आने वाले लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख उसके अभिन्न अंग हैं। विवाद की जड़ें 2019 में गहरी हुईं जब भारत ने अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसे नेपाल ने सिरे से खारिज कर दिया। इसके बाद 2020 में नेपाल ने अपने संविधान में संशोधन कर इन तीन विवादित क्षेत्रों को अपने आधिकारिक मानचित्र में शामिल कर लिया था।
कूटनीतिक समाधान की मांग
नेपाल सरकार ने अपनी नीति दोहराते हुए कहा है कि वह ऐतिहासिक तथ्यों, मानचित्रों और प्रमाणों के आधार पर भारत के साथ सीमा विवाद का समाधान चाहती है। हालांकि, भारत इन क्षेत्रों को उत्तराखंड का अटूट हिस्सा मानता आया है। कैलाश मानसरोवर यात्रा, जो हज़ारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, अब एक बार फिर दो पड़ोसी देशों के बीच मानचित्रों और संप्रभुता की इस जंग में उलझती नजर आ रही है।
सीमा विवाद की आग में फिर झुलसे रिश्ते : लिपुलेख से कैलाश यात्रा पर नेपाल ने जताया कड़ा ऐतराज, भारत-चीन को घेरा
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