नईदिल्ली(ए)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर संविधान के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान निर्माताओं ने समाज की जरूरतों को ध्यान में रखकर प्रविधान बनाए थे और नौ जजों की संविधान पीठ भी उस मूल संतुलन को नहीं बदल सकती।
ये जज कर रहे मामले की सुनवाई
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सुनवाई कर रही है।
पीठ में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, आगस्टीन जार्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जोयमाल्या बागची भी शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल तत्वों को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण पहलू पूजा का अधिकार है और यह पवित्र स्थलों पर संपन्न होता है। यदि इसे बाधित किया जाता है तो श्रद्धालुओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा।
इस पर न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा, “सामाजिक सुधार के नाम पर अनुच्छेद 25(1) के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता।”
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का आधार उनकी मासिक धर्म आयु है और मासिक धर्म को अब भी वर्जना के रूप में देखा जाता है। इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह नजरिये का सवाल है और महत्वपूर्ण यह है कि श्रद्धालु इसे किस रूप में देखते हैं।