
प्रयागराज(ए)। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामले में सफाई कर्मचारी के परिवार के पक्ष में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के उस आदेश को रद कर दिया है, जिसमें याची मोहम्मद अली को ‘वैध रूप से गोद लिया पुत्र न होने’ के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था।
कोर्ट ने विभाग का रवैया हठधर्मी बताते हुए 25 हजार रुपये हर्जाना भी लगाया है। कहा-याची और उसकी मां 2014 से न्याय के लिए भटक रहे हैं। जौनपुर निवासी याची के पिता अनवर अली उत्तर मध्य रेलवे में सफाई कर्मचारी थे और नौ मई 2014 को उनका निधन हो गया। परिवार में विधवा, तीन विवाहित पुत्रियां और एक नाबालिग पुत्र (याची) हैं। बालिग होने पर मां ने बेटे के लिए अनुकंपा नियुक्ति की मांग की, लेकिन विभागीय जांच में सामने आया कि याची अनवर अली की जैविक संतान नहीं था, बल्कि ट्रेन यात्रा के दौरान नवजात अवस्था में मिला था। इसी आधार पर विभाग और बाद में कैट ने दावा खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने माना कि याची का नाम पिता के सेवा अभिलेख, हाईस्कूल मार्कशीट, जन्म प्रमाणपत्र, आधार, वोटर आइडी, राशन कार्ड और जाति प्रमाणपत्र समेत कई दस्तावेजों में पुत्र के रूप में दर्ज है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक तंगी से उबारना है, इसलिए जांच का दायरा केवल परिवार के सदस्यों की संख्या और आर्थिक स्थिति तक सीमित रहना चाहिए था, न कि जन्म संबंधी तथ्यों की पड़ताल तक फैलना चाहिए था।

रेल विभाग का रवैया हठधर्मी बताते हुए कोर्ट ने 25 हजार रुपये हर्जाना भी लगाया
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह गोद लेने का मामला नहीं था, इसलिए वैध दत्तक ग्रहण साबित न होने का तर्क अप्रासंगिक है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कैट का छह फरवरी 2026 का आदेश रद कर दिया। विभाग को छह सप्ताह में तर्कसंगत आदेश पारित कर याची के दावे पर पुनर्विचार का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विभाग अब याची का दावा इस आधार पर खारिज नहीं कर सकता कि वह ट्रेन में मिला था या जैविक पुत्र नहीं था।