
नईदिल्ली(ए)। प्रदूषित हवा अब सिर्फ फेफड़ों और हृदय रोगों की वजह नहीं है, बल्कि महिलाओं में तेजी से बढ़ रहे स्तन कैंसर का एक गंभीर कारण भी बन रही है। अमेरिका में किए गए व्यापक अध्ययन ने संकेत दिया है कि वाहनों से निकलने वाला धुआं और हवा में मौजूद सूक्ष्म कण महिलाओं में स्तन कैंसर के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा रहे हैं। चिंताजनक बात यह है कि यह खतरा उन क्षेत्रों में भी पाया गया, जहां वायु गुणवत्ता सरकारी मानकों के अनुसार सुरक्षित मानी जाती है।
वर्ष 2018 में भारत में महिलाओं में पाए गए सभी नए कैंसर मामलों में लगभग 28% स्तन कैंसर थे। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के अनुसार वर्ष 2019 में स्तन कैंसर के 2,00,218 मामले दर्ज हुए, जो वर्ष 2023 में बढ़कर 2,21,579 पर पहुंच गए। वैश्विक अध्ययन दर्शाता है कि वर्ष 2022 में दुनियाभर में स्तन कैंसर से हुई 6,65,255 मौतों में से सबसे अधिक यानी 98,337 महिलाएं भारत में थीं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत में स्तन कैंसर तेजी से बढ़ रहा है और उच्च प्रदूषण स्तर इस खतरे को और गंभीर बनाता है।
- पब्लिक हेल्थ प्राथमिकता: भारत की कैंसर नीति को अब प्रदूषण-आधारित कैंसर रोकथाम के फ्रेमवर्क से जोड़ा जाना चाहिए।
- जन जागरूकता: महिलाओं में जागरूकता कम है कि वायु गुणवत्ता उनके कैंसर जोखिम को प्रभावित कर सकती है। स्वच्छ हवा के अभियानों में महिला स्वास्थ्य को विशेष एजेंडा मिलना चाहिए।
- शहरी योजना और परिवहन नीति: वाहनों का धुआं जोखिम बढ़ा रहा है। ट्रैफिक-मैनेजमेंट, कार-फ्री जोन, इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ ईंधन नीति पर तेजी जरूरी।
- स्वास्थ्य-जांच ढांचा: शहरी क्षेत्रों में नियमित ब्रेस्ट-स्क्रीनिंग बढ़ाई जाए, खासकर हाई-प्रदूषण जोन में।
- वैज्ञानिक अनुसंधान: भारत को अपने मल्टी-सिटी कोहोर्ट अध्ययन शुरू करने चाहिए, ताकि दीर्घकालिक प्रभाव स्पष्ट हों।
इसलिए साफ हवा सिर्फ पर्यावरण मुद्दा नहीं बल्कि भारत में महिलाओं की जान बचाने की प्राथमिक शर्त बन चुकी है। प्रदूषण नियंत्रण को कैंसर-नियंत्रण रणनीति के रूप में स्वीकार करने का समय आ गया है।
अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि हर व्यक्ति साफ हवा की तलाश में अपना घर नहीं बदल सकता, इसलिए जरूरत है कि सरकारें वायु गुणवत्ता को लेकर कठोर और प्रभावी नीतियां बनाएं। ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक वेरोनिका इरविन के अनुसार सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना, निजी वाहनों के उपयोग को कम करना और उत्सर्जन पर नियंत्रण करना आवश्यक है। भारत में वर्तमान पर्यावरण नीतियां अभी भी मुख्यतः फेफड़ों और हृदय रोगों पर केंद्रित हैं, जबकि प्रदूषण और स्तन कैंसर के बीच संबंध पर शोध एवं जागरूकता कम है। संसद और स्वास्थ्य मंत्रालय के स्तर पर इस विषय पर नीति चर्चा सीमित रही है, जबकि आंकड़े तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हैं।